CBSE Class 10 Vyakran Revision Notes for Figure of Speech

अलंकार (Figure  of Speech)

अलंकार शब्द दो शब्दों के योग से बना है।

अलम् + कार = अलंकार

अलम् का अर्थ है - भूषण, सजावट। अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करे, वह अलंकार है।                          

जिस प्रकार नारी अपने सौंदर्य को बढ़ाने के लिए आभूषणों का प्रयोग करती है, उसी तरह अलंकार का प्रयोग काव्य की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। अलंकार द्वारा काव्य में चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास करें।

    क. उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

    ख. सावन के बादलों-सी उसकी आँखें बरसने लगीं।

 

    क. राकेश की चाँदनीं यमुना के जल पर चमक रही है।

    ख. चारू,चन्द्र की चपल चाँदनीं चमक रही यमुना के जल पर। 

 

उपर्युक्त उदहारण में एक ही बात को दो अलग-अलग रूपों में कहा गया है। क वाक्य की अपेक्षा ख वाक्य में सौंदर्य अधिक है कारण कि अलंकार के प्रयोग से वाक्य में चमत्कार और सौंदर्य दोनों उत्पन्न हुआ है। 

अलंकार के भेद

अलंकारों के मुख्यत: दो भेद माने जाते हैं




शब्दालंकार  (Figure  of Speech Based on Words)                     

शब्दालंकार

काव्य में जहाँ किसी विशेष शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उपस्थित हो जाता है और उन शब्दों के स्थान पर उनके पर्याय शब्दों के रख देने से वह चमत्कार समाप्त हो जाता है, वहाँ शब्दालंकार माना जाता है।

शब्दालंकार के तीन भेद माने जाते हैं :
1. अनुप्रास: काव्य में जहाँ वर्णों की बार-बार आवृत्ति होने से चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण-

  • कालिंदी कूल कदंब की डार।
  • तरनि–तनुजा तात तमाल तरुवर बहु छाए।
  • मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्र बुलाए।
  • चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही है जल थल में


यमक अलंकार: काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार प्रयुक्त हो, लेकिन अर्थ हर बार भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदाहरण–

  • जे तीन बेर [तीन बार] खाती थीं ते तीन बेर [तीन बेर के दाने] खाती थी।
  • कनक कनक  ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
    वा खाये बौराय नर, वा पाये बौराय।।
    यहाँ कनक शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है जिसमें एक कनक का अर्थ है- धतूरा और दूसरे का स्वर्ण है।
  • जिसकी समानता किसी ने कभी पाई नहीं;
    पाई के नहीं हैं अब वे ही लाल माई के।
    यहाँ 'पाई' शब्द दो बार आया है। दोनों के क्रमशः 'पाना' और 'पैसा' दो भिन्न अर्थ हैं।
  • काली घटा [काले बादल] का घमंड घटा [कम होना]।

 

 3. श्लेष अलंकार:  श्लेष का अर्थ है चिपकना। जहाँ पर ऐसे शब्दों का प्रयोग हो जिनके एक शब्द से दो या अधिक अर्थ चिपके हो, वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण–

  • जे रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
    बारे उजियारो करै, बढ़े अंधेरों होय।
    उपर्युक्त उदाहरण में देख सकते हैं कि रहीम जी ने दोहे के द्वारा दीये एवं कुपुत्र के चरित्र को एक जैसा दर्शाने की कोशिश की है। रहीम जी कहते हैं कि शुरू में दोनों ही उजाला करते हैं लेकिन बढ़ने पर अँधेरा हो जाता है।
    यहाँ बढ़े शब्द से दो विभिन्न अर्थ निकल रहे हैं। दीपक के सन्दर्भ में बढ़ने का मतलब है बुझ जाना जिससे अँधेरा हो जाता है। कुपुत्र के सन्दर्भ में बढ़ने से मतलब है बड़ा हो जाना।
    बड़े होने पर कुपुत्र कुकर्म करता है जिससे परिवार में अँधेरा छा जाता है। एक शब्द से ही दो विभिन्न अर्थ निकल रहे हैं अतः यह उदाहरण श्लेष अलंकार के अंतर्गत आएगा।

 

  • माया महाठगिनि हम जानी।
    तिरगुन फाँस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
    यहाँ 'तिरगुन' शब्द में शब्द श्लेष की योजना हुई है। इसके दो अर्थ है- तीन गुण-सत्त्व, रजस्, तमस्। दूसरा अर्थ है- तीन धागोंवाली रस्सी। 

  • चरण धरत चिंता करत,
    चितवत चरों ओर।
    सुवरन को खोजत फिरत,
    कवि, व्यभिचारी, चोर।
    यहाँ पर सुवरन के तीन अर्थ है कवि के लिए सुवरन अर्थात् सुंदर वर्ण या शब्द है तो चोर के लिए सुंदर स्त्री और वहीँ चोर के लिए सुवरन सोना या स्वर्ण है।



अर्थालंकार  (Figure  of Speech Based on Meanings)

अर्थालंकार- काव्य में जहाँ अर्थ के माध्यम से काव्य में कोई चमत्कार उत्पन्न होता, वहाँ अर्थालंकार होता है।

अर्थालंकार के पाँच भेद माने जाते हैं-

  1. उपमा अलंकार: काव्य में जब किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना दूसरे समान गुणवाले वस्तु या व्यक्ति से की जाय तब वहाँ पर उपमा अलंकार होता है।
    उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं-
    • उपमेय- जिसकी उपमा दी जाय, अर्थात जिसकी समता दूसरे पदार्थ से दिखलाई जाय। जैसे- कर कमल-सा कोमल है। इस उदाहरण में 'कर' उपमेय है।
    • उपमान- जिससे उपमा दी जाय, अर्थात उपमेय को जिसके समान बताया जाय। उक्त उदाहरण में 'कमल' उपमान है।
    • साधारण धर्म- 'धर्म' का अर्थ है 'प्रकृति' या 'गुण'। उपमेय और उपमान में विद्यमान समान गुण को ही साधारण धर्म कहा जाता है। उक्त उदाहरण में 'कमल' और 'कर' दोनों के समान धर्म हैं- कोमलता।
    • वाचक- उपमेय और उपमान के बीच की समानता बताने के लिए जिन वाचक शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें ही वाचक कहा जाता है। उपर्युक्त उदाहरण में 'सा' वाचक है।

 इस अलंकार की पहचान -सा,से,सी,सम,समान,सदृश्य, सरिता,सरिस,जिमि,इवआदि शब्दों से की जा सकती है।
उदाहरण

  • पीपर पात सरिस मन डोला।
    राधा बदन चन्द्र सो सुन्दर।
    प्रस्तुत पक्ति में 'राधा' के बदन की तुलना 'चन्द्र' से की गई है अतः यहाँ पर उपमा अलंकार  है।

  • हरि पद कोमल कमल से
    यहाँ पर हरि के पैरों की तुलना कमल से की गई है।

  • नीलकमल से सुंदर नयन
    यहाँ पर नयनों की तुलना कमल से की गई है।

  • हाय फूल सी कोमल बच्ची
    हुई राख की थी ढेरी
    यहाँ पर बच्ची की तुलना फूल से की गई है।

  

2. रूपक अलंकार: जहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाय, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

पहचान- रूपक अलंकार में अधिकतर योजक चिह्न (-) का प्रयोग देखा जाता है।

उदाहरण

  • पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो
    उपर्युक्त उदाहरण में राम रतन को ही धन बता दिया गया है। ‘राम रतन’ – उपमेय पर ‘धन’ – उपमान का आरोप है एवं दोनों में एकरूपता है। यहाँ आप देख सकते हैं कि उपमान एवं उपमेय में एकरूपता दर्शायी जा रही है। हम जानते हैं कि जब एकरूपता दर्शायी जाती ही तब वहाँ रूपक अलंकार होता है।

  • चरण-कमल बंदौ हरिराई
    यहाँ पर इस उदाहरण में भी चरण (उपमेय) और कमल (उपमान) में तुलना न करते हुए चरण और कमल में एकरूपता दर्शाई गई है। अर्थात् चरण ही कमल है।

 

  • मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहौं
    यहाँ पर भी चाँद को ही खिलौना कहा जा रहा है अर्थात् दोनों में एकरूपता दर्शाई जा रही है।  

 

3. उत्प्रेक्षा अलंकार: जहाँ उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है, वहा उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। यहाँ भिन्नता में अभिन्नता दिखाई जाती है।

पहचान– इस प्रकार के अलंकार में मनु, जनु, मानो, जानो, मनहु जनहु, जैसे शब्दों का प्रयोग देखा जाता है।

उदाहरण–

  • कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
    हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए।
    उपर्युक्त पक्तियों में उत्तरा के ऑसूओ से भरे नयनों (उपमेय) में जल कण युक्त (उपमान) की संभावना की गई है। साथ ही यहाँ पर मानो वाचक शब्द का भी उपयोग हुआ है।

  • उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उसका लगा
    मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा
    यहाँ पर क्रोध से भरे शरीर में सागर की संभावना की गई है। साथ यहाँ पर भी मानो वाचक शब्द का प्रयोग हुआ है।

  • सोहत ओढ़ै पीतु पट, स्याम सलौने गात,
    मनौ नीलमणि सैल पर आतपु परयै प्रभाव।
    यहाँ पर कृष्ण के ओढ़े हुए पीले वस्त्र के सौंदर्य की संभावना नीलमणि पर्वत पर सुबह के सूर्य के साथ की गई है। साथ ही यहाँ पर मनौ वाचक शब्द का भी प्रयोग हुआ है।


 

4. अतिशयोक्ति अलंकार: जहाँ पर लोक-सीमा से बढ़ा-चढ़ाकर किसी विषय का वर्णन होता है । वहाँ पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण

  • आगे नदिया खरी अपार, घोरा कैसे उतरे पार।
    राणा ने सोचा इस पार,तब तक चेतक था उस पार।।
    यहाँ पर राणा ने सोचा और घोडा नदी पार चला गया जोकि असम्भव है इसलिए यहाँ पर अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

  • देख लो साकेत नगरी है यही।
    स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही है।।
    यहाँ पर साकेत नगर की वैभवता को स्वर्ग से से मिलने जा रही है बताया जा रहा है जो यहाँ पर बढ़ चढ़कर वर्णन ही प्रतीत हो रहा है इसलिए यहाँ पर अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

 

  • हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग।
    लंका सगरी जल गई, गए निशाचर भाग
    इस उदाहरण में भी देखिए अभी हनुमान की पूँछ में आग लगने भी न पाई थी कि सारी लंका जल उठी और सारे निशाचर भाग उठे जोकि असंभव से बात प्रतीत होती है। अत: यहाँ पर भी अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

 

5. मानवीकरण अलंकार:  जहाँ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं या क्रियाओं का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

उदाहरण

  • मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के
    यहाँ पर मेघों को मानव का रूप दिया गया है।

  • उषा सुनहले तीर बरसती,
    जय-लक्ष्मी सी उदित हुई।
    यहाँ पर उषा को जय-लक्ष्मी जैसी बताया जा रहा है ।

  • दिवसावसान का समय
    मेघमय आसमान से उतर रही
    संध्या सुंदरी परी-सी धीरे-धीरे
    यहाँ पर संध्या अर्थात् शाम को परी के समान सुंदर बताया जा रहा है।

  • आए महंत बसंत
    यहाँ पर बसंत ऋतु को महंत (व्यक्ति) बताया जा रहा है।