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ICSE Class 10 Saaransh Lekhan Vah Janm Bhumi Meri (Sahitya Sagar)

Vah Janm Bhumi Meri Synopsis

सारांश

प्रस्तुत कविता में कवि ने भारत भूमि की विशेषताओं का गुणगान किया है। कवि ने भारत के उत्तर में खड़े हिमालय पर्वत जो भारत के गौरव का प्रतीक है। दक्षिण दिशा में स्थित हिंद महासागर भारत माँ के चरणों का स्पर्श करके मानो अपने सौभाग्य पर इतराता है। इस देश में गंगा यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदी का अनोखा संगम है भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में कल कल बहते हुए झरने यहाँ की शोभा बढ़ाते हैं।

कवि ने इस भूमि पर जन्म देने वाले वीर महापुरुषों जैसे राम-सीता, कृष्ण, गौतम आदि तथा उनके कार्यों का उल्लेख किया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और आदर्श सीता ने अपने चरित्र से मानव जाति को प्रेरणा दी है। श्रीकृष्ण के निष्काम कर्मयोग तथा बुद्‌ध के ज्ञान और दया ने इस देश को महिमाशाली बनाया है।

यहाँ अनेक धर्मों की स्थापना हुई जिससे मनुष्य को एक नई जीवन दृष्टि मिली यह देश कर्म प्रधान देश है। ये वह मातृभूमि है जो सदैव कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। कवि कहते हैं कि यह भारत भूमि ऐसी भूमि है जो शांति और अहिंसा की वाहक है तथा धर्म और न्याय की रक्षक है।

कवि ने भारत को अनेक नामों जैसे जन्मभूमि, मातृभूमि, पुण्यभूमि, युद्धभूमि, धर्मभूमि, कर्मभूमि, स्वर्णभूमि आदि अनेक नामों से संबोधित किया है।

 

भावार्थ / व्याख्या

वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।

ऊँचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है,

नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुना त्रिवेणी नदियाँ लहर रही हैं,

जगमग छटा निराली पग-पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी, वह स्वर्ण भूमि मेरी।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारत भूमि की विशेषताओं का गुणगान किया है। कवि ने भारत के उत्तर में खड़े हिमालय पर्वत जो आकाश को चूमता है हमारे भारत के गौरव का प्रतीक है। दक्षिण दिशा में स्थित हिंद महासागर भारत माँ के चरणों का स्पर्श करके मानो अपने सौभाग्य पर इतराता है। इस देश में गंगा यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदी का अनोखा संगम है। इसी कारण कवि को अपनी जन्मभूमि पर गर्व है। यह उसकी पुण्यभूमि और स्वर्ण भूमि भी है।

 

वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते जिसकी पहाड़ियों में,

चिड़िया चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं कोयल पुकारती है,

बहती मलय पवन है, तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी, वह कर्मभूमि मेरी।

कवि कहते हैं कि भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में कल कल बहते हुए झरने यहाँ की शोभा बढ़ाते हैं। इसी देश की झाड़ियों में चिड़िया निरंतर चहकती रही है तथा वातावरण को आनंदमय बनाती है। देश में बड़े-बड़े आमों के पेड़ है जहाँ पर कोयल सदा पुकारती रहती है। मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित वायु तन-मन को सँवारती रहती है। इसी कारण कवि अपनी जन्मभूमि को धर्मभूमि और कर्मभूमि भी मानता है।

 

वह जन्मभूमि मेरी वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति, जन्मी जहाँ थी सीता,

श्रीकृष्ण ने सुनाई, वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया,

जग को दया सिखाई, जग को दिया दिखाया।

वह युद्ध-भूमि मेरी, वह बुद्ध-भूमि मेरी।

वह मातृभूमि मेरी, वह जन्मभूमि मेरी।

कवि ने इस भूमि पर जन्म देने वाले वीर महापुरुषों जैसे राम-सीता, कृष्ण, गौतम आदि तथा उनके कार्यों का उल्लेख किया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और आदर्श सीता ने अपने चरित्र से मानव जाति को प्रेरणा दी है। श्रीकृष्ण के निष्काम कर्मयोग तथा बुद्‌ध के ज्ञान और दया ने इस देश को महिमाशाली बनाया है।

 

यहाँ अनेक धर्मों की स्थापना हुई जिससे मनुष्य को एक नई जीवन दृष्टि मिली यह देश कर्म प्रधान देश है। ये वह मातृभूमि है जो सदैव कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। कवि कहते हैं कि यह भारत भूमि ऐसी भूमि है जो शांति और अहिंसा की वाहक है तथा धर्म और न्याय की रक्षक है।