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ICSE Class 10 Saaransh Lekhan Swarg Bana Sakte Hai (Sahitya Sagar)

Swarg Bana Sakte Hai Synopsis

सारांश

प्रस्तुत अंश दिनकर जी की प्रसिद्ध रचना‘ कुरुक्षेत्र’ से लिया गया है। महाभारत युद्ध के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास जाते हैं। वहाँ भीष्म पितामह उन्हें उपदेश देते हैं। यह भीष्म पितामह का युधिष्ठिर को दिया गया अंतिम उपदेश है। 40 के दशक में लिखी गई इस कविता के द्वारा कवि भारत देश की सामाजिक दशा, उसके विकास में उपस्थित बाधाओं और उसमें परिवर्तन कर उसे स्वर्ग समान बनाने की बात करते हैं।

प्रस्तुत कविता में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं कि इस धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति का इस भूमि पर समान हक़ है इसलिए प्रकृति प्रदत्त सभी वस्तुओं का उपभोग आपस में मिल बाँटकर करना चाहिए। मार्ग में आने वाली हर रुकावट का का सामना भी मिलकर करना चाहिए। हर व्यक्ति को हर एक के सुख दुःख को समझना होगा। किन्तु कुछ स्वार्थी मनुष्यों ने लोभवश उन पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया है और समाज में भेद-भाव को जन्म दिया है जिससे संघर्ष की सृष्टि हो रही है। ईश्वर ने इस संसार को इतना सुखों का विशाल भंडार दिया है कि यदि मनुष्य चाहे तो इस धरती को स्वर्ग बना सकता है। अत: मनुष्यों को अपने लोभ का त्याग कर समाज में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की स्थापना करनी चाहिए और धरती को स्वर्ग के समान बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार इस कविता द्वारा आपस में मिलजुलकर रहने, एक दूसरे की सहायता, भावना को समझने और जीवन की समस्याओं पर विजय पाने के बारे में कहा गया है।

 

भावार्थ/ व्याख्या


धर्मराज यह भूमि किसी की

नहीं क्रीत है दासी

है जन्मना समान परस्पर

इसके सभी निवासी।

 

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियों में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते है कि यह धरती किसी की खरीदी हुई दासी नहीं है। इस पर जन्म लेने वाले सभी एक समान है। सभी इस धरती के निवासी हैं।

सबको मुक्त प्रकाश चाहिए

सबको मुक्त समीरण

बाधा रहित विकास, मुक्त

आशंकाओं से जीवन।

 

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियों में पितामह भीष्म युधिष्ठिर कहते हैं कि हर व्यक्ति को समान रूप से प्रकाश और वायु चाहिए। उसके जीवन का विकास बाधारहित होना चाहिए। इसके अलावा उसका जीवन भय से मुक्त होना चाहिए।

लेकिन विघ्न अनेक अभी

इस पथ पर अड़े हुए हैं

मानवता की राह रोककर

पर्वत अड़े हुए हैं ।

 

भावार्थ- भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं कि इस धरती को स्वर्ग बनाने के लिए अनेक बाधाएँ खड़ी हैं। विभिन्न वर्गों में बँटे हुए समाज में समानता को लाना कठिन है। मानवता की राह रोककर अनगिनत मुसीबतें खड़ी हैं। धर्म जाति-पाति,वर्ग- तथा वर्ण भेद जैसी अनेकों मुसीबतों ने इंसान का मार्ग रोक रखा है।

 

न्यायोचित सुख सुलभ नहीं

जब तक मानव-मानव को

चैन कहाँ धरती पर तब तक

शांति कहाँ इस भव को?



भावार्थ – भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं कि जब तक इस धरती पर रहने वाले मानव को न्याय के अनुसार सुख-सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो जातीं तब तक वह चैन से नहीं बैठ सकता। और जब तक मानव का मन अशांत है क्या इस धरती पर शान्ति की कल्पना की जा सकती है? अर्थात् नहीं। ऐसी स्थिति में तो समूचे विश्व में शांति खोजने पर भी नहीं मिलेगी। इसलिए यह जरुरी है कि सभी व्यक्तियों को समान रूप में न्याय के अनुसार उसके विकास के लिए सुख-सुविधाओं का प्राप्त होना अत्यंत आवश्यक है।


जब तक मनुज-मनुज का यह

सुख भाग नहीं सम होगा

शमित न होगा कोलाहल

संघर्ष नहीं कम होगा।


भावार्थ– कवि का मानना है कि जब तक जीवन में समता का सुख नहीं होगा, तब तक मनुष्य के मन में असंतोष रहेगा और असंतोष के कारण अशांति बनी रहेगी। अन्याय के विरुद्ध मानवता का आन्दोलन का शोर तब तक कम नहीं होगा जब तक प्रकृति के साधन सबको समान रूप से नहीं मिल जाते।

 

उसे भूल वह फँसा परस्पर

ही शंका में भय में

लगा हुआ केवल अपने में

और भोग-संचय में।


भावार्थ – मानव अपने कर्तव्यों को भूलकर संदेह के जाल में फँसकर रह गया है। भयभीत होकर वह अपनी शक्ति को बढ़ाने और सांसारिक चीजों का संग्रह करने में जुटा हुआ है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि मानव केवल स्वयं का हित साधने में दिन-रात संघर्षरत है। उसे किसी भी तरह इस धरती पर रहने वाले अन्य लोगों की परवाह नहीं है। ऐसे में शांति की कल्पना करना असंभव है।



प्रभु के दिए हुए सुख इतने

हैं विकीर्ण धरती पर

भोग सकें जो उन्हें जगत में,

कहाँ अभी इतने नर?

 

भावार्थ– ईश्वर ने मानव को इस धरती पर अनेक प्रकार के सुखों का इतना विशाल भंडार दिया हुआ है कि यदि उसका सही ढंग से इस्तेमाल किया जाय तो धरती के सभी मानव भी उसका उपभोग करके खत्म नहीं कर सकते।



सब हो सकते तुष्ट एक-सा

सब सुख पा सकते हैं

चाहें तो पल में धरती को

स्वर्ग बना सकते हैं।

 

भावार्थ –  ईश्वर ने मानव को जो अमूल्य भंडार दिया है, उससे धरती के सभी मानव तृप्त हो सकते हैं। यदि मनुष्य स्वार्थ रहित होकर यदि इन सुखों को समतापूर्वक भोगे तो सबको सुख भी प्राप्त होगा और सभी संतुष्ट भी रहेंगे। आवश्यकता है तो परस्पर तालमेल की। ऐसा करके यदि वे चाहें तो धरती को स्वर्ग में बदल सकते हैं।