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ICSE Class 10 Saaransh Lekhan Bhed Or Bhediye (Sahitya Sagar)

Bhed Or Bhediye Synopsis

सारांश



इस कहानी में भेड़ और भेड़ियों को प्रतीक बनाकर लेखक ने समाज में व्याप्त राजनेताओं के चरित्र को उजागर किया है कि किस तरह वे आम जनता को अपने लुभावने वादों में फँसाकर वोट हथिया लेते हैं और सत्ता में आने के बाद इन्हीं आम लोगों को भूल जाते हैं। ‘भेड़ और भेड़िये’ कहानी हमें राजनीतिज्ञों के षडयंत्रों तथा अपने चुनाव के अधिकार के सही प्रयोग करने के बारे में भी बताती है। भोली-भाली जनता को नेता और उनके चापलूस मिलकर गुमराह करते रहते हैं। अत: जनता को चाहिए कि वे सतर्क और सावधान रहकर अपने अधिकारों का प्रयोग करें।
कहानी का सार इस प्रकार है-
एक बार वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए और इसके लिए प्रजातंत्र की स्थापना करनी चाहिए। इस प्रकार पशु समाज में प्रजातंत्र की स्थापना का ‘क्रांतिकारी’ परिवर्तन आया।
पशु समाज ने जब प्रजातंत्र की स्थापना की बात सोची तो उन्हें लगा कि अब उनके जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण युग आ जाएगा इसलिए पशु में हर्ष की लहर दौड़ पड़ी।
प्रजातंत्र की स्थापना की कल्पना से भेड़ों को लगा कि अब उनका भय दूर हो जाएगा। वे उनके प्रतिनिधियों से कानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारी किसी को न सताएँ, न मारे। सब जिएँ और जीने दें का पालन करेंगे। उनका समाज शांति, बंधुत्व और सहयोग पर आधारित होगा।
वन-प्रदेश में भेड़ों और अन्य छोटे पशुओं को मिलाकर उनकी संख्या नब्बे प्रतिशत थी इसलिए यदि प्रजातंत्र की स्थापना होती है, तो वहाँ भेड़ों का ही राज होगा और यदि भेड़ों ने यह कानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे तो भेड़ियों को खाना कैसे मिलेगा। इसलिए भेड़ियों ने सोचा कि प्रजातंत्र की स्थापना से उनपर संकटकाल आ गया है। वन-प्रदेश में भेड़ों की संख्या अधिक थी और यदि प्रजातंत्र की स्थापना हो गई तो भेड़ियों के पास भागने के अलावा कोई चारा नहीं था इसलिए सियार ने भेड़ियों को सरकस में जाने की सलाह दी।
प्रजातंत्र की खबर से भेड़िये बड़े परेशान थे। उन्हें इससे बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। ऐसे समय में बूढ़े सियार ने जब उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई कि वह कोई न कोई योजना बनाकर भेड़ियों की मदद कर देगा तो भेड़ियों ने बूढ़े सियार की बात मानने का निश्चय किया।
अपनी योजना को सफल बनाने के लिए बूढ़े सियार ने भेड़िये को एक संत के रूप में बदल दिया उसने भेड़ों के सामने उसे उनका हितचिंतक और शुभचिंतक के रूप में पेश किया। अपनी योजना को सफल बनाने के लिए बूढ़े सियार ने अपने साथियों को रंगने के बाद भेड़िये के रूप को भी बदला। भेड़िये का रूप बदलने के बाद बूढ़े सियार ने उसे तीन बातें याद रखने की सलाह दी कि वह अपनी हिंसक आँखों को ऊपर न उठाए, हमेशा जमीन की ओर ही देखें और कुछ न बोलें और सब से जरुरी बात सभा में बहुत-सी भेड़ें आएगी गलती से उनपर हमला न कर बैठना। अपनी योजना को सफल बनाने के लिए सियार ने तीन सियारों को क्रमशः पीले, नीले और हरे में रंग दिया और भेड़ों के सामने उनका परिचय इस प्रकार दिया कि पीले रंगवाला सियार विद्वान, विचारक, कवि और लेखक है, नीले रंगवाले सियार को नेता और स्वर्ग का पत्रकार बताया गया और वहीँ हरे रंगवाले सियार को धर्मगुरु का प्रतीक बताया गया।
बूढ़े सियार ने एक संत के आने की खबर पूरे वन-प्रदेश में फैला रही थी इसलिए उसको देखने के लिए भेड़ें बड़ी संख्या में सभा-स्थल पर मौजूद थीं। पर जब उन्होंने अपने सामने संत के रूप में भेड़िये को देखा तो वे डर के मारे भागने लगीं।
भेड़ियों के चुनाव का प्रचार बूढ़े सियार की देखरेख में किया गया। बूढ़े सियार ने अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग करते हुए तीन रंगें हुए सियारों का प्रयोग करके भेड़ियों के समर्थन में जनमत तैयार किया और इस तरह बूढ़े सियार ने बड़ी ही चालाकी से भोली भेड़ों को बरगला दिया।
बूढ़े सियार की बातों में फँसकर भेड़ों को लगा कि भेड़िया अब संत बन चुका है यदि वह चुनाव जीतता है तो वह भेड़ों के हितों के लिए कार्य करेगा। उन्हें लगने लगा कि भेड़ियों से बढ़कर उनका कोई हित-चिंतक और हित रक्षक नहीं है।
चुनाव जीतने के बाद भेड़ियों ने पहला कानून यह बनाया कि रोज सुबह नाश्ते में उन्हें भेड़ का मुलायम बच्चा खाने को दिया जाए, दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए।