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ICSE Class 10 Saaransh Lekhan Apna Apna Bhagya (Sahitya Sagar)

Apna Apna Bhagya Synopsis

सारांश

‘अपना अपना भाग्य’ कहानी द्वारा लेखक ने अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर नैतिकता, परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया है। प्रस्तुत कहानी का बालक केवल इसलिए मृत्यु को प्राप्त हो जाता है क्योंकि कोई उसकी मदद नहीं करता। यदि समय पर उस बालक की सहायता होती तो न केवल वह जीवित रहता अपितु समाज का एक जिम्मेदार नागरिक भी बन सकता था। लेखक इस कहानी द्वारा यह भी संदेश दे रहे हैं कि समाज के निचले तबके की ओर सभी की सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है और उसका निर्वाह भी किया जाना चाहिए अपना-अपना भाग्य कहकर जिम्मेदारी से मुक्त होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

कहानी का सार इस प्रकार है-

लेखक अपने मित्र के साथ नैनीताल में संध्या के समय बहुत देर तक निरुद्देश्य घूमने के बाद एक बेंच पर बैठे थे कि दूर कोहरे के बीच से उन्हें एक काली-सी मूर्ति आती प्रतीत होती है। पास आने पर उन्हें एक लड़का दिखाई देता है नंगें पैर, नंगें सिर, एक मैली सी कमीज लटकाए अपने सिर के बड़े-बड़े बालों को खुजाता चला आ रहा था।उसकी चाल से कुछ भी समझ पाना लेखक को असंभव सा लग रहा था क्योंकि उसके पैर सीधे नहीं पड़ रहे थे। उस बालक का रंग गोरा था परंतु मैल खाने से काला पड़ गया था, ऑंखें अच्छी, बड़ी पर सूनी थी माथा ऐसा था जैसे अभी से झुरियों आ गईं हो।

दोनों को आश्चर्य होता है कि इतनी ठंड में यह बालक बाहर क्या कर रहा है। वे उससे तरह-तरह के प्रश्न करते हैं।

बालक अपनी घर की गरीबी और भुखमरी से तंग आकर अपने एक साथी के साथ यहाँ भाग आया था। यहाँ आने पर उसे और उसके साथी को एक दुकान में काम के बदले में एक रूपया और झूठा खाना मिलता था। लेखक के उसके साथी के विषय में पूछने पर वह बताता है कि मालिक के मारने पर उसका साथी मर गया। उस दस वर्षीय बच्चे का मौत के विषय में इतना सहज कथन लेखक को सोचने पर मजबूर कर देता है कि जिस उम्र में बच्चों को शरारतों और खेलने-खाने से फुरसत नहीं होती उस उम्र में इस बालक की पहचान मौत से हो गई।

थी। लेखक के एक वकील मित्र थे, जिन्हें अपने होटल के लिए एक नौकर की आवश्यकता थी इसलिए लेखक उस बच्चे को वकील साहब के पास ले गए।

वकील उस बच्चे को नौकर इसलिए नहीं रखना चाहते थे क्योंकि वे और लेखक दोनों ही उस बच्चे के बारे में कुछ जानते नहीं थे। साथ ही वकील साहब को यह लगता था कि पहाड़ी बच्चे बड़े शैतान और अवगुणों से भरे होते हैं। यदि उन्होंने ने किसी ऐरे गैरे को नौकर रख लिया और वह अगले दिन वह चीजों को लेकर चंपत हो गया तो। इस तरह भविष्य में चोरी की आशंका के कारण वकील साहब ने उस बच्चे को नौकरी पर नहीं रखा।

बालक कुछ देर वहाँ ठहरा और फिर वहाँ से चला गया। लेखक और उसके मित्र भी अपने-अपने कमरों में चल पड़ते हैं। दूसरे दिन मोटर में बैठते हुए उन्हें यह समाचार मिलता है कि पिछली रात एक पहाड़ी बालक की सड़क के किनारे पेड़ के नीचे ठिठुरकर मृत्यु हो गई।

पर बतलाने वालों ने यह भी बताया कि गरीब के मुँह पर छाती, मुट्ठियों और पैरों पर बर्फ की हल्की-सी चादर चिपक गई थी, मानो दुनिया की बेहयाई ढँकने के लिए प्रकृति ने शव के लिए सफ़ेद और ठंडे कफ़न का प्रबंध कर दिया था।